One Liner

Teri yaad ilaaj e gham hai. Soch tera muqaam kya hoga.

Unki khushboo nahin jaati ghar se,  Ek muddat huyi mehmaan gaye.

Wo rukhtas hua to nazar mila kr nhi gya. Wo kyu gya ye bhi bta kr nhi gya.

Parhne waalon ka qehat hai warna. Girte aansoo kitaab hote hain.

Zindagi ki duayein nahin dijiye. Zid nahin kijiye, doobne dijiye.

Shauq se tod dijiye talluq magar. Raaste ki mulaqaat baaqi rahe.

Mar b jai to nhi milte ha marne wale, na jane maut le ja kr kaha chodti ha.

Dil ki basti ajeeb basti hai.. Lootne waalon ko tarasti hai.

Jo chaho nikaal lo matlab. khamoshi hamesha guftagu pe bhari hai.

Maut hai ek lafz be maane. Jisko maara hayaat ne maaara.

Woh jo tumhein mera karde. Woh harf e dua kahan se laaon..!!

Mohabbat na mili tazurba hi sahi.. aaj zindagi se kuch to kama laye hum.

Tere aane se shayad qaraar aaye.. Dil e betaab behalta nahin behlane se.

Jab tere baare mein sochte hain. Lafz saare dua ho jaate hain.

Aaj dil be sabab dhadakta hai, Aaj shayad teri khabar aaye.

Koi tadbeer (solution) bhoolne ki nahin. Yaad aane ke sau bahaane hain.

Hum se mat poocho raaste ghar ke. Hum 'musafir' hain zindagi bhar ke.

Zakhm gahre nahi the jab dil ke. Dard mein iss qadar mithaas na thi.

Phir kisi gham ne pukaara shayad. Kuch ujaala sa hua hai dil mein.

Mann ka marham kahin nahin bikta. Sau dukaanein, hazaar thhele hain.

Bade khamosh mizaaj lagte hain. Apne seene mein toofaan dabaane wale

Woh mujhe zindagi samajhta hai faraz. Kya usse mera aitebaar nahin.

Sehma sehma daraa sa rehta hai. jaane kyun jee bhara sa rehta hai.

Kab kaha tha usne laut aayega. Dil yun hi intezaar karta hai.

Phir meri aankhein ho gayi nam-naak. Phir kisi ne mizaaj poocha hai.

Kitna mushkil sawaal poochh liya. Tumne haal-chaal poochh liya.

Aadmi ko pet ke khaalipan se jyada. dil ka khaalipan tod deta hai.

Mar gaye khwaab sabki aankhon ke../ Har taraf gila hai haqeeqat ka.

Barish mein mitti ki khushbu. Bahut dhundha par aisa koi itr na mila.

Dafn hona hai uski aankhon mein. Ye meri aakhri wasiyat hai.

Har shakh pe ullu baitha hai. anjam e gulistan kya hoga.

====================================================


फ़राज़ ग़म भी मिलते हैं नसीब वालों को हर एक के हाथ कहाँ ये खज़ाने लगते हैं.

देख किसी को हिकारत कि नज़र से. हर चेहरा किसी का महबूब होता है

मर जाइये तो नामो-नसब (जात -पात) पूछता नहीं .मुर्दों के सिलसिले में बहुत मेहरबां है

शिकन चेहरे पर और माथे पर बल पड़े. इतना हंसिये कि आँसू निकल पड़ 

किस की पनाह में तुझको गुज़ारे जिंदगी. रास्तों ने भी तो कह दिया, घर क्यों नहीं जाते

हमारे क़त्ल को मीठी ज़ुबान है काफ़ी. अजीब शख़्स है ख़ंजर तलाश करता है.!

अपने भी नाम का तेरे तरकश में तीर है. ये सुन के हम तेरे ही निशाने पे गए

बैठो दूर हमसे, देखो खफा हो. किस्मत से मिल गए हो, मिल के जुदा हो !!

इक तिरी याद का आलम कि बदलता ही नहीं. वरना वक़्त आने पे हर चीज़ बदल जाती है.

मोबाइल ओफ होते ही रिश्ते ठंडे पड़ जाते हैं, दिल से दिल का कनेक्शन अब वो नहीं रहा  

पहुँचे जिस वक़्त मंज़िल पे तब ये जाना. ज़िन्दगी रास्तों में बसर हो गई

वो मुस्कुरा के ज़रा जिससे बोल लेता है, तमाम दिल के इरादे टटोल लेता है.

वो बचपने की नींद तो अब ख़्वाब हो गयी. क्या उम्र थी कि रात हुई और सो गये

लोग शोर से जाग जाते हैं. और मुझे तेरी ख़ामोशी सोने नहीं देती

सांस की डोर पर इस जिस्म का चलते जाना. ज़िन्दगी की निशानी तो हो नहीं सकता

मुझ को होने दे ये एहसास के मैं जिंदा हूँ इक ना इक ज़ख्म मेरे दिल का हरा रहने दे .!!

लोग कुछ और रंग दे देंगे कोई नेकी भी बरमला करो (बरमला= सबके सामने)

मुझे चाहने वाले अक्सर रूठ जाते हैं मुझसे हम सच बोलते हैं यही गुनाह करते है

मुझको ढूँढ लेता है नित नए बहाने से दर्द हो गया है वाकिफ, मेरे हर ठिकाने से ||

सियासत मुफलिसोँ पर ये एहसान करती है.आँखे छीनती है और चश्मे दान करती है .!

सारे अल्फ़ाज़ उदासियों पर ही ख़र्च हो गए, जब ख़ुशी आई तो लफ्ज़ों से तन्हा हो गए !

तू मुझसे दूरियां बढ़ाने का शौक पूरा कर,मेरी भी ज़िद है तुझे हर दुआ में मांगूंगा

बड़ा अजीब ज़हर था उसकी यादों में सारी उम्र गुजर गयी मुझे मरते-मरते.."

"मुझ" को "मुझ" में जगह नहीं मिलती तू है मौजूद इस कदर "मुझ" में |

ख़ुद से मिलकर बहुत उदास था आज वो जो हँस-हँस के सबसे मिलता था

यूँ ही दिन गुज़र गया रात यूँही ढल गई बच बच के हमसे ज़िन्दगी निकल गई

आँखें भी खोलनी पड़ती हैं रौशनी के लिए महज़ सूरज निकलने से अँधेरा नहीं जाता."!

शाम होते ही तेरे साथ गुज़ारे लम्हात. ताजगी ले के मेरे घाव मैं जाते

अपना चेहरा न बदला गया.आईने से खफा हो गए

आजकल का इश्क जन्मों का रोग नहीं लम्हों का नशा है.

ग़म बयाँ करने का कोई और ढंग ईजाद कर तेरी आँखों का ये पानी तो पुराना हो गया..!!

यकीन ना करना हर बार का रोना रोने वालो का, आँसु नही होता हर बार आँखो का पानी..

कागज़ पे रख कर रोटियां खायें भी तो कैसे, खून से लथपथ आता है अखबार आज कल..

बह गए कितने सिकंदर वक्त के सैलाब में अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो

यूँ तो लाखो हैं रंजिशें दिलो में लेकिन हंस के बा अदब मिल लिए. तो बुरा क्या है !

कमबख्त के हिचकियाँ रूकती क्यों नहीं किस के ज़ेहन में के रुक गया हूँ मैं.

क्या हुआ गर खुशी नहीं बस में मुसकुराना तो इख़्तियार में है।

कभी कुछ कह के पछताये कभी चुप रह के पछताये

जाने क्या बात है होने को जी बहुत चाहता है रोने को.!

                                                                                                                             12 Aug' 13  01.07 am     

No comments:

Post a Comment